लालू रेल बिरसामुंडा जेल पहुंचकर फंस गई लालू की रेल खींचतान कर बाहर निकले, बिगड़ गया सब खेल। बिगड़ गया सब खेल भइया, छूटे सब संगी साथी ‘राम’ और ‘हनुमान’ बन चुके अब भगवा के साथी।। कुनबा नाथ-नाथ कर बढ़ा रहे हैं कुनबा राजनाथ पार्टी छोड़कर जाने वाले खुद को पाए अनाथ। खुद को पाए अनाथ, समय फिर पलटा खाया रथ रोकने वालों को, मोदी नाम ही भाया।।
अर्थशास्त्र बिगड़ गई अर्थव्यवस्था, जनता हो गई तंग भ्रष्टाचार-घोटाले बन गए यूपीए के अंग। कहें ‘बाबा’ मनमोहन को ले डूबी महंगाई काम न आया अर्थशास्त्र, चिंता में सोनिया माई।।
बुरे हाल सर्वेक्षण बता रहे, हैं बुरे नीतीश के हाल गठबंधन के साथी सामने ठोक रहे हैं ताल। ठोक रहे हैं ताल, सामने नमो-सुमो की जोड़ी जाने किसके हाथ आएगी सत्ता की डोरी।।
गोल घर में कांड कर गए राजनीति के भांड! लोकतंत्र में दौड़ रहे हैं कैसे छुट्टा सांड! जनता की आँखों में अब तक जो झोंक रहे थे धूल चक्कूबाज़ सदन में पहुंचे सबकी हिल गयी चूल.
तौबा-तौबा कर रहा बिल जनलोकपाल, इस्तीफ़ा दे घर लौट गए आप के केजरीवाल. ...........................
राजनीति में फँस गया आकर एक शुतुरमुर्ग का अण्डा, घड़ी-घड़ी उठा रहा भारत माँ का झण्डा. ............................
मील का पत्थर हूँ, किनारे हूँ, किन्तु अन्तस्थ धँसा हूँ हर मंज़िल मुझसे होकर गुज़रती है. पथिक! अनभिज्ञ हो तुम न चाहो, फिर भी निगाहें ढूंढ़ेंगी मुझसे मंज़िल का पता पूछेंगी. मैं त्रस्त नहीं, अभ्यस्त हूँ, अभिशप्त हो सकता हूँ, कदाचित उपेक्षित नहीं. मील का पत्थर हूँ ज्ञात-अज्ञात मंज़िलों से बदा अभिलेख हूँ , सभी के काम आये वो शिला लेख हूँ. राह पूछकर चलते बनो रुको मत, मैं किसी की मंज़िल नहीं, न मेरी कोई मंज़िल.
मैंने देखा है
सम्भ्रान्त इलाके की गगनचुम्बी इमारतों के नीचे
उस लाल बत्ती पर
एक बच्ची को
एक वक़्त की रोटी के लिए
नक्कारे की गूंज पर
करतब करते हुए
मैंने देखा है....
एक संभावित भविष्य को
सिस्टम के आगे पस्त
करतब करते नट को
भूख का भय दिखाने के लिए
मुखाकृति विकृत करते
चेहरे पर स्वांग रचाते
मैंने देखा है...
अमीरों के कनॉट प्लेस बाज़ार में
जीवन से जूझते वृद्ध को
आयातित गाडि़यों के शीशे के पार से
घिघिया कर तुच्छ खिलौने बेचने की कोशिश करते
और उससे मुंह मोड़ते धन कुबेरों को
मैंने देखा है...
पुलिस मुख्यालय के सामने
सड़क पर ख़ून से लथपथ
घंटों दर्द से कराहते युवक को
अनदेखा कर सभ्य समाज के रहनुमाओं को
स्पन्दनहीन आगे बढ़ते
और मुख्यालय के गेट पर संतरी को
मुस्तैदी से ड्यूटी बजाते
मैंने देखा है...
भीड़ में अनजाने छुअन पर
सैंडल दिखाती सम्भ्रान्त घरों की युवतियों/महिलाओं को
व्यस्त सड़कों पर
फर्राटे से भागती कारों में
परिचित पुरुष को चुम्बन देते
मैंने देखा है...
ट्रेन में रेल कानून झाड़ते
एक अदद सीट के लिए
अपने पीछे घूमते जरूरतमंद यात्री पर
ईमानदारी की धौंस जमाने वाले टीटीई को
20 रुपये रिश्वत के लिए
सवारियों से हुज्जत करते
मैंने देखा है....
भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में
जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में
तख्तियां, झंडे लहराते हुए
रिश्वतखोरों को
भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ
जि़न्दाबाद के नारे लगाते
मैंने देखा है...
आज़ादी ले लोsss
अभिव्यक्ति का गला घोंटने के लिए
लोकतंत्र का जनाज़ा निकालने के लिए
आज़ादी ले लोsss…
बेटियों-बहनों की अस्मत लूटने के लिए
देश को खोखला करने के लिए
आज़ादी ले लोsss...
६६ साल की रवायत कायम रखने के लिए
१२५ करोड़ की टोपी घुमाने के लिए
आज़ादी ले लोsss....
.........................
ने sssss ता
इसमें सुर और ताल दोनों है
सा रे गा मा प ध नि
ता थई थई तत आ
जनता ही बेसुरी है.
नेता एकम नेता नेता दूनी भाषण नेता तिया आश्वासन नेता चौके कुर्सी नेता पंजे सियासत नेता छके दल-बदल नेता सत्ते मौका परस्त नेता अठे घोटाला नेता नवें दर्शन दुर्लभ नेता दहाई पांच साल में प्रकट.
मैं विश्रांत हूँ... गतिहीन होकर
शून्य में लटक रहा हूँ!
पूर्ण निस्तब्धता न कोई कोलाहल न कोई अंतर्द्वंद्व एकाग्रचित्त होकर भविष्य को निहार रहा हूँ.
तुम्हारे... उनके वैचारिक प्रदूषण से मुक्त ठहर चुका हूँ नए सृजन के निहितार्थ!
कुंद पड़ते विचारों को धार दे रहा हूँ अब उस पर नहीं होगी बीते ऋतुओं के प्रभावों की छाप!
लंगड़े अतीत! यहीं तक साथ था वह देख रहे हो... गतिमान सुरमई लहरों के पार वहीँ जाना है परन्तु, तुम नहीं जा सकोगे कोई नाव नहीं जाती उस पार यहीं ठहरो! कभी कभी मिलने आ जाया करूँगा तुमसे.
संतोष कर लो यह जान कर तुम्हारी मंजिल अब यहीं और मेरी... उस पार.
विधाता तुमसे दो प्रश्न- सृष्टि तुमने रचा? कितने रंग भरे इसमें? बस तीन....!!! देखो, इंसानों ने कितने गढ़ दिए. अनंत काल से श्रेष्ठ समझे जाते रहे
सर्वोच्च स्थान पाते रहे प्रासाद में दृश्य होकर भी अदृश्य रहे! ढूंढ लिया सदृश कण कदाचित इंसान तुम्हारे उतना ही करीब है जितने तुम होकर भी नहीं किन्तु 'कण' की तरह ठोकर में नहीं. परदा ऊठ रहा है नेपथ्य में क्या हुआ स्पष्ट दिख रहा है सृष्टि तुमने नहीं रचा.
विधाता! पुनः दो प्रश्न- भ्रष्टाचार किसकी देन? तुम या समय बलवान कौन? सर्वशक्ति के मद में इतराते रहे! अनंत काल से पूज्य रहे प्रकट रूप से कतराते रहे तुम छलिया.... बलवान तो समय निकला. भ्रष्टाचार का कलंक मानव मस्तक पर है तुम क्यों चढ़ावा पाते हो?
अच्छा....एक प्रश्न शेष- परलोक...मृत्युलोक... क्या घनचक्कर है? दोनों यहीं दूसरा कोई ज्ञात लोक नहीं फिर यह भेद क्यों?
.... तो क्या समझूँ? तुम वो हो जो नहीं हो या वो हो जो खोज लिए गए! तुम क्या हो? कल्पना अथवा साकार निर्दिष्ट अथवा निराकार? हा हा हा मुझे बताना.