July 27, 2010

सोचता हूँ

अगर मैं लड़की होती
किसी अनजान के साथ
उम्रभर के लिए
बंध गयी होती...
सिगरेट की तरह सुलगती
रसोई में बर्तन घिसती
और घर के किसी कोने में
पड़ी चुपचाप क्या सुबक रही होती!
या अपने भाग्य पर इतराती!
नारी होने पर गौरवान्वित होती!!!
मार्च ८ २०१०

2 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

गहराई लिए हुए सुन्दर रचना ....! आपके ब्लॉग पर प्रथम बार आया ,,,,अच्छा लगा ,,,शब्दों के इस सुहाने सफ़र में आज से मैं भी आपके साथ हूँ ,,,चलो साथ चलते है ,,............!

रवि धवन said...

वाह! बहुत दिनों बाद आए हो। मगर क्या आए हो। बढिय़ा