December 2, 2012

पिल्ले

कुक्कुर मिलाप मौसम की पैदाइश
जाड़े की दस्तक के साथ काफी बढ़ गयी है
राहगीरो! संभल कर गुज़रना
गली के पिल्ले अब बड़े हो गए हैं.

November 30, 2012

मैं विश्रांत हूँ

मैं विश्रांत हूँ...
गतिहीन होकर
शून्य में लटक रहा हूँ!

पूर्ण निस्तब्धता
न कोई कोलाहल
न कोई अंतर्द्वंद्व
एकाग्रचित्त होकर भविष्य को निहार रहा हूँ.

तुम्हारे... उनके
वैचारिक प्रदूषण से मुक्त
ठहर चुका हूँ
नए सृजन के निहितार्थ!

कुंद पड़ते विचारों को
धार दे रहा हूँ
अब उस पर नहीं होगी
बीते ऋतुओं के प्रभावों की छाप!

लंगड़े अतीत!
यहीं तक साथ था
वह देख रहे हो...
गतिमान सुरमई लहरों के पार
वहीँ जाना है
परन्तु, तुम नहीं जा सकोगे
कोई नाव नहीं जाती उस पार
यहीं ठहरो!
कभी कभी
मिलने आ जाया करूँगा तुमसे.

संतोष कर लो
यह जान कर
तुम्हारी मंजिल अब यहीं
और मेरी... उस पार.



November 20, 2012

विधाता

विधाता तुमसे दो प्रश्न-
सृष्टि तुमने रचा?
कितने रंग भरे इसमें?
बस तीन....!!!
देखो, इंसानों ने कितने गढ़ दिए.
अनंत काल से श्रेष्ठ समझे जाते रहे

सर्वोच्च स्थान पाते रहे
प्रासाद में दृश्य होकर भी
अदृश्य रहे!
ढूंढ लिया सदृश कण
कदाचित इंसान तुम्हारे उतना ही करीब है
जितने तुम होकर भी नहीं
किन्तु 'कण' की तरह ठोकर में नहीं.
परदा ऊठ रहा है
नेपथ्य में क्या हुआ
स्पष्ट दिख रहा है
सृष्टि तुमने नहीं रचा.

विधाता! पुनः दो प्रश्न-
भ्रष्टाचार किसकी देन?
तुम या समय
बलवान कौन?
सर्वशक्ति के मद में इतराते रहे!
अनंत काल से पूज्य रहे
प्रकट रूप से कतराते रहे
तुम छलिया....
बलवान तो समय निकला.
भ्रष्टाचार का कलंक
मानव मस्तक पर है
तुम क्यों चढ़ावा पाते हो?

अच्छा....एक प्रश्न शेष-
परलोक...मृत्युलोक...
क्या घनचक्कर है?
दोनों यहीं
दूसरा कोई ज्ञात लोक नहीं
फिर यह भेद क्यों?

.... तो क्या समझूँ?
तुम वो हो जो नहीं हो
या वो हो जो खोज लिए गए!
तुम क्या हो?
कल्पना अथवा साकार
निर्दिष्ट अथवा निराकार?
हा हा हा
मुझे बताना.

July 30, 2012

बरसते क्यों नहीं?

२४ जुलाई

हरामखोर बादलो!
अब गरजना मत
रोज़ आसमान में देखता हूँ
अस्त-व्यस्त बिखरे रहते हो
जैसे क्षत-विक्षत लाशें.

नामुरादों,
मार्ग में ज्यादा गतिरोधक हैं!
दिशा भ्रम हो गया है!!
या वहाँ भी कर्फ्यू है!!!
बरसते क्यों नहीं?

तनिक सूरज को देखो
और ज्यादा उग्र हो चला है
पसीना बाँट रहा है
सुना क्या, अब तो बरस...

पथरायी आँखों में
खुबे इन्द्रधनुष भी नहीं दीखते क्या?
सूखे की आहट सबने सुन ली
तुमने सुना
मौत घात लगाये बैठी है
लेकिन बहाना वही क़र्ज़ होगा.
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अभागा दरख़्त

२० जुलाई

दफ्तर के सामने खड़े ठूंठ दरख़्त पर
बरबस निगाह ठहर जाती है
आसपास के पेड़ों पर किसलय
आह! यह कितना अभागा?

हरा- भरा था तब पथिकों को पनाह देता रहा
झुलसे बदन को ठंढक देता रहा
अपने शाखों पर न जाने कितने परिंदों को आश्रय दिए
सूख चुका, फिर भी उसी दर्प से खड़ा है.

इसमें जीवन नहीं है
फिर भी कुछ जीवों का घर है
इस आस में कि जलना है किसी रोज़
किसी दरिद्र नारायण के चूल्हे में
अब भी मौसम की क्रूरता सहता है.

किन्तु सरकार की ईमान इसकी इच्छापूर्ति नहीं होने देगी
जानते हुए... मर चुका है, दरिद्र के घर जलने नहीं देगी.

क्षणिकाएं

५ जुलाई

बहुत मुश्किल है जीना
यहाँ तो पत्थर भी पूजे जाते हैं.
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८ जुलाई

सुबह से ही आसमान में
पर्वतों का डेरा है
आज फिर किसी ग़म ने घेरा है...
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तन भीगा, मन भी भीगने देते
रात पड़ी थी, प्यास बड़ी थी
मेह तनिक और रिसने देते...
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मैं वही हूँ
वहीँ हूँ, जहां से
वर्तमान अतीत बन गया...
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२१ जुलाई

सरकार की कामचोर नीतियों का असर दिख रहा है
रुपहले परदे पर भी बॉडी से प्राण निकल रहा है...
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सोनिया जी सोनिया जी एक काम कीजिये
अपने दिमाग को आराम और बेटे को दूसरा काम दीजिये...
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तुमसे क्या शिकवा गिला करें
तुम्हें तो बैठाया ही था सर आँखों पर
नींद हराम करने के लिए.
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२२ जुलाई

यूपीए कब तक खैर मनायेगा
गठबंधन को टूटने से बचाने
अब कोई प्रणब नहीं आएगा.
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२३ जुलाई
यूपी में प्रगति पर है अखिलेश का काम
बदल दिए गए फिर आठ जिलों के नाम.
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क्या तब भी तुम पूजे जाओगे?


६ जुलाई

विधाता! सुना तुमने
इंसानों ने खोज लिया
वह कण
... किन्तु तुम
उसमें भी नहीं मिले!
अस्तित्व से पर्दा उठेगा
उत्पत्ति का रहस्य भी खुलेगा
एक प्रश्न...
क्या तब भी तुम पूजे जाओगे?
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