December 18, 2011

दो शब्द

दो शब्द
(तुम्हारे लिए)

ये गेसू
खुले हुए
काले घने
मेघ जैसे...
 

गहरी, चंचल
दो आँखें
खुली हो
जैसे कि
पाखी की
पांखें, आस
कोई उम्मीद
पल रही
हो जैसे...
 

दो अधर
उन्मुक्त हंसी
निश्चिन्त भाव
वही तेज
वही ताव
एक अदा
सबसे जुदा
फूल कोई
खिला हो
अभी जैसे...
 

मुखमंडल  पर
एक आभा
मासूमियत, शांति
समर्पण, संतुष्टि
उदार व्यक्तित्व
दृढ निश्चय
संयमित जीवन
मिठास भरी
हो जैसे...

October 4, 2011

बीती बातें

दिमाग की तंग
घुमावदार गलियों में
कुछ यादें-
अनकही, कुछ बीती बातें
किसी के कहे
कुछ चुभते शब्द
निरंतर दीवारों से
टकराते हैं
मुझे उकसाते हैं!

अक्सर अनसुना कर देता हूँ
कई बार नज़रंदाज़ करता हूँ
फिर भी
इंसान ही तो हूँ न
आ ही जाता हूँ
कभी-कभी बहकावे में
तब क्रोध जागता है
बदले के भाव
उमड़ते हैं जेहन में
और मन कुछ कर गुज़ारना चाहता है!

क्षण भर बाद ही
अचानक विवेक जागता है
संतुलन बनाने के लिए
पूछता है-
इससे किसका हित होगा?
जवाब नहीं होता कोई
फिर डूबता जाता हूँ
गहन अंधकार में
यह सोचकर
मैं कुछ नहीं कर सकता!

घंटों...
कभी-कभी
कई-कई दिनों की उधेड़बुन से
दिमाग की नसें
तन जाती हैं
अब-तब
जाने कब फट जाएँगी
और प्रचंड वेग से
दौड़ते लहू की धार
फूट पड़ेगी
...ये भी नहीं होता!

आजिज आकर
नाइन एमएम पिस्तौल उठाता हूँ-
आज दिमाग को खाली कर दूंगा
इसमें सूराख कर
रोशनदान बना दूंगा
...ताकि अन्दर चक्कर काटती यादें
बहार निकल आयें
खुली फिजां में
और ताज़ी हवा का झोंका
अंदरूनी हिस्सों को ठंडा कर सके!

पर कायर मन
काँप उठाता है
एक तर्क पेश करता है-
सूराख दो बनेंगे
दो खिड़कियाँ
यानि दो रास्ते!
तब क्या अन्दर घूमती यादें
कन्फ्यूज़ नहीं होंगी?
दोराहा देखकर
क़दम ठिठक नहीं जायेंगे!

द्वंद्व के बाद
एक चिर शांति!
सन्नाटा
और रह जाती हैं
सैकड़ों झींगुरों की
झनझनाहट
जो कहीं ज्यादा खतरनाक है!




August 9, 2011

जीवन का सर्कस

शाम ढली
अँधेरे को विस्तार मिला
चाँद भी खो चूका मद्धम चांदनी
हम भी फिक्रमंद घर को चले.

सड़कों पर बेतहाशा भीड़
आदमी पर चढ़ रहा आदमी
गोया जीवन नहीं
कोई सर्कस का खेल हो

यूँ ही मर जायेंगे
किसी रोज़
करतब करते करते
छुट जाएँगी निशानियाँ
बस रह जायेंगे
मीलों लम्बे रास्ते.


रिक्तता

बार-बार मन उद्विग्न होता है
तब आँखें कुछ तलाशती हैं
कुछ मिलता नहीं
सिवाय रिक्तता
एक शून्य के...

मन और उत्तप्त होता है जब
लेट जाता हूँ
आँखें मूँद कर
देखता हूँ अक्स को
महसूस करता हूँ
सांत्वना देतीं स्मृतियों को
ओझल होते
आहिस्ता आहिस्ता.

आकुल, व्याकुल
मन छटपटाता है
तन के पिंजर को तोड़ कर
निकल भागना चाहता है
क़ैद से
मौत के दिन गिनते/
मृत्युदंड पाए
किसी कैदी की मानिंद.

इस आपाधापी में
ह्रदय पर प्रचंड आघात (!)
एक टीस ubharti है
और पलकों के पोरों से
कुछ बूँदें लुढ़का जाती है.

तन  शिथिल पड़ जाता है
निर्जीव सी
निगाहें जड़ जाती हैं
कालचक्र की भाँती
द्रुत वेग से घूमते पंखे के डैनों पर.

गोलाकार तल
दो इंच मोती वृत्तीय रिक्तता 
यानी बड़ा शून्य
और एक बड़ी chhadm  
वृत्ताकार aakriti
निहारता rahta हूँ
der तक 
अपलक  .

मस्तिष्क सोचने को होता है
पर सोच नहीं पता
साहस कम है
गहरे पैठ नहीं पाता!

तब निष्प्राण तन में
हरकत होती है
एक हाथ हवा में लहराता है
आस पास बिखरे
किताबों, अखबारों के ढेर में
टटोलता है
सिगरेट का पैकेट
और दूसरा हाथ
दियासलाई या लाइटर
पर नहीं मिलता
ग्रीवा को
कष्ट प्रदान कर
सर को चौथाई दायें
चौथाई बाएं
घुमा कर देखता हूँ
और श्वेत दंडिका प्रज्ज्वलित कर
निकोटिन धमनियों में उड़ेल देता हूँ
शरीर प्रतिरोध करता है
लेकिन मैं
फ़िक्र को धुएं में उड़ा देता हूँ.





July 14, 2011

मुझे पाषाण बना दो

सुनो ...
मुझे पाषाण बना दो
जिसमें न ह्रदय
न भावनाएं,
न संवेदनाएं हों
न इसके धड़कने का डर हो
किसी से आहत
न दुःख से द्रवित हो
आंसुओं से भी जो

बेखबर, बेअसर हो
ऐसा मुझे निष्ठुर एक इंसान बना दो.


   

July 8, 2011

कभी पूछना

कभी पूछना बादलों से
इस बसंत नभ क्यों रोया था?
क्यों पेड़ों की शाखों पर झूले सूने-सूने थे?
प्रेम का मौसम था
फिर भी मन के उपवन क्यों सूने-सूने थे?
कभी पूछना मन अकुलाया क्यों था?
पिंजड़े के कैदी थे
सोते थे नींद नहीं क्यों आती थी!
कोई ख्वाब पीछे छूट रहा था
कोई साथ कहीं से छूट रहा था
एक साथ कई कई आजमा रहे थे
प्रेम की कसौटी पर कस रहे थे
तब कौन टूटा था?
कभी पूछना
फिर क्या हुआ था?
फिर क्या हुआ था?
सुनो, मैं बताता हूँ
दो मौतें हुई थीं

दो जीवन बदला था
एक अनमना, दूजा पगला सा
ढूंढा था अक्स

आइना मिला था.

March 1, 2011

बस इतना ही था विश्वास!

टूट रहा विश्वास कहो यह किसका है
तेरा है या मेरा है?
कहो अक्स मेरे

क्यों मुझसे तुम दूर हुए?
दोनों में कौन बड़ा था
झूठी कसम या मेरा विश्वास?
ये किस पाश में मुझको फांस दिया?
न जी सकूँ
न मर सकूँ
कैसे भ्रम में डाल दिया!
थोड़ा संयम तुम और रखते 
 एक बार मुझसे तो कहते
छूट रहा है साथ!
आह मेरे अक्स
बस इतना ही था विश्वास!