January 1, 2011
October 14, 2010
बाँध दिया है खुद को
एक डोर से बाँध दिया है खुद को
जब लगे दूर जा रहा हूँ
आहिस्ता अपनी ओर खींचना
रिश्तों को ताज़ा रखना!
न मानूँ, डांटना-फटकारना
कभी प्यार से समझाना...
मैं बहती नदी की मनमौज धारा हूँ
हर बार दूर भागूँगा
नयी राह बनाना मेरी फितरत है.
हमारे रिश्तों को
तुम्ही संभाल के रखना
मैं उसपर जमा गर्द धोता रहूँगा
राह गर मुश्किल लगे कहना
मैं बिछ जाऊंगा.
न कभी दूर होना, न मुझे दूर होने देना,
क्योंकि मैंने खुद को
एक बंधन में बाँध जो दिया है...
जब लगे दूर जा रहा हूँ
आहिस्ता अपनी ओर खींचना
रिश्तों को ताज़ा रखना!
न मानूँ, डांटना-फटकारना
कभी प्यार से समझाना...
मैं बहती नदी की मनमौज धारा हूँ
हर बार दूर भागूँगा
नयी राह बनाना मेरी फितरत है.
हमारे रिश्तों को
तुम्ही संभाल के रखना
मैं उसपर जमा गर्द धोता रहूँगा
राह गर मुश्किल लगे कहना
मैं बिछ जाऊंगा.
न कभी दूर होना, न मुझे दूर होने देना,
क्योंकि मैंने खुद को
एक बंधन में बाँध जो दिया है...
September 10, 2010
July 27, 2010
May 7, 2010
तुम याद आओगी
तुम याद आओगी
जब मैं तनहा
छत पर बैठूँगा
और तन को छूकर
गुजर जाया करेगी हवा.
यादों में महका करोगी
संदल सी और
ह्रदय में बसोगी
धड़कन की तरह.
कभी इठलाती
फूलों की डालियों की लचक देखूंगा
तब भी याद आओगी तुम.

भोर की किरणे
जब तहस नहस कर रही होंगी
अँधेरे का साम्राज्य
तब अलसाई आँखों से
आहिस्ता आहिस्ता
एक नयी सुबह देखूंगा
उस वक़्त भी तुम याद आओगी...
जब मैं तनहा
छत पर बैठूँगा
और तन को छूकर
गुजर जाया करेगी हवा.
यादों में महका करोगी
संदल सी और
ह्रदय में बसोगी
धड़कन की तरह.
कभी इठलाती
फूलों की डालियों की लचक देखूंगा
तब भी याद आओगी तुम.

भोर की किरणे
जब तहस नहस कर रही होंगी
अँधेरे का साम्राज्य
तब अलसाई आँखों से
आहिस्ता आहिस्ता
एक नयी सुबह देखूंगा
उस वक़्त भी तुम याद आओगी...
April 27, 2010
मैं ज़रूर आऊंगा
मुझे dhundhna याद करना
और मन करे तो
बस एक आवाज़ देना
मैं आऊंगा.
बेला, गुलाब, जूही
चंपा-चमेली के
गुलदस्ते लाऊंगा.
कभी सावन सा बरसूँगा
मेह बनकर
कभी बसंत के
रंग दे जाऊंगा.
मुझे बुलाना
ज़रूर आऊंगा
आँगन के अमलतास
और दरवाज़े पर खड़े गुलमोहर
की डालों पर फूल दे जाऊंगा
तुम महका करना
मुझे याद करके
चौंका करना
तुमसे मिलूँगा
इन्हीं फूलों के बीच
तुम्हें तारो ताज़ा करने के लिए
कहो बुलाओगी न?
और मन करे तो
बस एक आवाज़ देना
मैं आऊंगा.
बेला, गुलाब, जूही
चंपा-चमेली के
गुलदस्ते लाऊंगा.
कभी सावन सा बरसूँगा
मेह बनकर
कभी बसंत के
रंग दे जाऊंगा.
मुझे बुलाना
ज़रूर आऊंगा
आँगन के अमलतास
और दरवाज़े पर खड़े गुलमोहर
की डालों पर फूल दे जाऊंगा
तुम महका करना
मुझे याद करके
चौंका करना
तुमसे मिलूँगा
इन्हीं फूलों के बीच
तुम्हें तारो ताज़ा करने के लिए
कहो बुलाओगी न?
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