अरी कोयल!
घर के पीछे वाले
गुलमोहर की डाल पर आकर बैठ
कोई गीत सुना
ऐसी तान कोई छेड़
रोम रोम खिल उठे...
ओ बया!
तुम तो अब दिखती ही नही
अपना हुनर
मुझे भी सिखा दो
अहा!
इतना सुंदर घोंसला है!!
बुलबुल तुझे तो
बचपन के बाद देखा ही नहीं
तब एक पिंजरा होता था तुम्हारा घर
पिताजी बैठ तुमसे घंटों बतियाते
गीत कोई सिखाते
क्या तुमने
वह गीत किसी को सिखाया भी?
और मेरे मिट्ठू मियाँ!
तुम तो धोखेबाज निकले
तुम्हें तो कभी
पिंजरे में नहीं रखा
हमेशा खुला छोड़ा
फ़िर क्यों, क्यों भागे?
पूरा ज्ञान पा लिया था क्या?
गौरैये कभी-कभी
अब भी आती हैं दाना चुगने
घर के ओसारे में
बाकि सब तो जैसे
भूल ही गए रास्ता
कहाँ ढूंढूं इन्हें?
काक भुशुण्डी
तुम तो अक्सर
छत के मुंडेर से
अतिथि आगमन का संदेश लाते थे
तुम भी नहीं आते अब
उनका संदेश
कौन देगा मुझे
इस बियाबान में!
June 11, 2009
June 9, 2009
26. लहरों ये क्या किया?
अ़री ओ सुनामी लहरों
तुमने ये क्या किया?
हजारों सपनो पर पानी फेर दिया!!
जब भी तुम आवेश में आती हो
तटों से सैकड़ों-हजारों घर
बहा ले जाती हो
...किंतु ये घर नही थे
ये तो सपने थे
जिन्हें लाखों जोड़ी आंखों ने
हकीकत में बदले थे।
अब तुम कभी आवेश में मत आना
बस तटों को छू कर चली जाना।
तुमने ये क्या किया?
हजारों सपनो पर पानी फेर दिया!!
जब भी तुम आवेश में आती हो
तटों से सैकड़ों-हजारों घर
बहा ले जाती हो
...किंतु ये घर नही थे
ये तो सपने थे
जिन्हें लाखों जोड़ी आंखों ने
हकीकत में बदले थे।
अब तुम कभी आवेश में मत आना
बस तटों को छू कर चली जाना।
25. शायद भगवान इन्हीं को कहते हैं
कभी उनसे भी पूछिए
जो अट्टालिकाओं में बैठे हैं
गरीबों की नहीं
धनकुबेरों की जो सुनते हैं
जेब खाली हो तो
इनके दर्शन भी दुर्लभ हैं
बगैर चढावे के सुनते नहीं
दुनिया में जो सबसे ताकतवर है
शायद भगवान् उन्ही को कहते हैं ...
जो अट्टालिकाओं में बैठे हैं
गरीबों की नहीं
धनकुबेरों की जो सुनते हैं
जेब खाली हो तो
इनके दर्शन भी दुर्लभ हैं
बगैर चढावे के सुनते नहीं
दुनिया में जो सबसे ताकतवर है
शायद भगवान् उन्ही को कहते हैं ...
April 3, 2008
संस्कृत में शोले
संस्कृत में शोले के संवाद कुछ इस तरह होंगे .....
गब्बर -कालिया तव किम भविष्यसि ?
कालिया - महोदयः मया भवतः लवणं खादितवान।
गब्बर - इदानीं गोलिकाम अपि खादत ...पंचाशत पंचाशत योजनं दूरं यदा को अपि बालकः रुदती , तदा तस्य माता वदति वत्स शयनं कुरु अन्यथा गब्बर आगमिष्यति।
गब्बर -कालिया तव किम भविष्यसि ?
कालिया - महोदयः मया भवतः लवणं खादितवान।
गब्बर - इदानीं गोलिकाम अपि खादत ...पंचाशत पंचाशत योजनं दूरं यदा को अपि बालकः रुदती , तदा तस्य माता वदति वत्स शयनं कुरु अन्यथा गब्बर आगमिष्यति।
January 16, 2008
24. हो कौन तुम?
हो कौन तुम अरुणिम उषा सी
स्मृतियों में बन मेह
बरसने आयी.
यह किसके ताप से
घनीभूत पीड़ा मस्तक की
अश्रु बन
नैनों से आज बहने आयी
कहो ये अमराई किसकी
बूँद-बूँद पीता हूँ
हरपल उसकी यादों में जीता हूँ।
कहो सखी तुम कौन
मुझसे प्रीत तो सच्ची है?
यकीन नहीं होता हिस्से की
खुशी अभी बची है ...
स्मृतियों में बन मेह
बरसने आयी.
यह किसके ताप से
घनीभूत पीड़ा मस्तक की
अश्रु बन
नैनों से आज बहने आयी
कहो ये अमराई किसकी
बूँद-बूँद पीता हूँ
हरपल उसकी यादों में जीता हूँ।
कहो सखी तुम कौन
मुझसे प्रीत तो सच्ची है?
यकीन नहीं होता हिस्से की
खुशी अभी बची है ...
January 14, 2008
23. चलो बच्चा बन जाएँ
चलो फिर से बच्चा बन जाएँ
यादों की
कच्ची धूप में
बचपन की सैर कर आयें
...और माँ के आँचल से
ढेर सारा स्नेह बटोर लायें...
यादों की
कच्ची धूप में
बचपन की सैर कर आयें
...और माँ के आँचल से
ढेर सारा स्नेह बटोर लायें...
22. मन चाहता है
आज मन लिखना नहीं
कुछ कर गुज़रना चाहता है
अतीत के स्याह पन्ने से
निकल भागना चाहता है
किसी की यादों में खोने
उसकी अमराई में उतराना
रूप लावण्य को बूँद-बूँद पीना चाहता है
सच कहूं तो
मन अब जीना चाहता है ....
कुछ कर गुज़रना चाहता है
अतीत के स्याह पन्ने से
निकल भागना चाहता है
किसी की यादों में खोने
उसकी अमराई में उतराना
रूप लावण्य को बूँद-बूँद पीना चाहता है
सच कहूं तो
मन अब जीना चाहता है ....
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