January 14, 2008

23. चलो बच्चा बन जाएँ

चलो फिर से बच्चा बन जाएँ
यादों की
कच्ची धूप में
बचपन की सैर कर आयें
...और माँ के आँचल से
ढेर सारा स्नेह बटोर लायें...

22. मन चाहता है

आज मन लिखना नहीं
कुछ कर गुज़रना चाहता है
अतीत के स्याह पन्ने से
निकल भागना चाहता है
किसी की यादों में खोने
उसकी अमराई में उतराना
रूप लावण्य को बूँद-बूँद पीना चाहता है
सच कहूं तो
मन अब जीना चाहता है ....

21. मन क्यों भटकता है?

क्यों मन तुम्हारी यादों के सिवा
कहीं और नहीं भटकता?
क्यों यादें मुझे ले जाती हैं तुम तक?
क्यों तरुवर की शाखों से फूल नहीं
तुम्हारी खुशबू बरसती है?
क्यों शाम की तन्हाइयां
अब ड्स्ती नहीं
गुदगुदाती हैं
रोम रोम पुलकित कर जाती हैं?
क्यों मन तुम्हारा आगोश पाने को
आतुर रहता है?
क्यों वह पल थम नहीं जाता
जब हम आलिन्गन्बध्ध होते हैं?
क्यों ज़माने की क्रूर अंगुलियाँ
उठती हैं कलेजे को दुखाने को?
क्यों समझते नहीं लोग
मन के भावों को?

20. साया

जब साया भी साथ छोड़ दे
जीवन से ख़त्म होने लगे उम्मीदें
...और तुम अंधेरों में घिर जाओ
फिर पुकारना
में अवश्य आऊंगा
तुम्हें एक नया आकाश दिखाऊंगा
जहाँ धरती मिलती है
आकाश से!

January 2, 2008

19. परछाइयाँ

क्यों पीछा करती हैं

ये परछाइयां

कभी उजाले में भटक कर

बिखर जाती हैं

कभी स्याह रातों में
गुम हो जाती हैं

किन्तु...

सदैव इर्द-गिर्द ही

रेंगती हैं परछाइयां

कभी आगे

...कभी पीछे!

कितने यत्न किये

नहीं छोड़ती पीछा।
मन आशंकित
स्वयम से ही सशंकित
पूछें तो किससे
आखिर क्यों पीछा करती हैं
ये परछाइयां।

18. मुझे मत जोड़ना...

अगर में टूट जाऊँ
मुझे मत जोड़ना
अगर में खो जाऊँ
मुझे मत ढूंढ़ना
...इन चलती-फिरती लाशों में;
क्योंकि तब
में वहाँ नहीं
कहीं और जा चुका होऊंगा!
जब कभी आये मेरी याद
नयनों से अश्क नहीं
बगिया से कोई फूल नहीं
मरघट से सन्नाटा ले आना...
में वहीं मिलूंगा
बस ...
इन अधरों से आहिस्ता पुकारना।

17. अजीब शहर

यह शहर बड़ा अजीब है
यहाँ के लोग
लक्ष्मी के करीब हैं,
कुबेर इनके अर्दली
और पाप इनके मित्र हैं।

यह शहर अँधा है
मत पूछो
स्याह शीशे के पीछे
क्या गोरखधंधा है।

यह शहर
अपनी समृध्धि पर अकड़ता है
दो बूँद नीर के लिए
पड़ोसियों की अनुकम्पा पर पलता है।

जनाब यह दिल्ली है
जाने किसने
यहाँ के लोगों की
मानवता छीन ली है।

यहाँ के लोग
अब बदल गए हैं
क्यों न बदलें
धनकुबेर जो बन गए हैं!