June 7, 2013

मेरे पीछे मत आना

मेरे पीछे मत आना,
यह रास्ता आगे बंद है
तुमने जिस वजह से छोड़ा,
वो जेब आज भी तंग है.

ख्यालों में आसरा मांगने वालों
मेरे हाल पर छोड़ दो
मुझ तक पहुँचने के रास्ते
बहुत तंग हैं.

तुमने, उसने
हर इक शख्स ने
जो भी दिया, बेपनाह दिया
उसका गवाह ये अंग है.

दुआ करना...कभी सामना न हो
ग़र हो भी जाये
तो फासला रखना
क्योंकि क्रोध पर मेरा नियंत्रण कम है.

March 2, 2013

नेता

हम अपना पेट सहलाते हैं,
तुम भूख भूख चिल्लाओ
फिर भी जो सुन नहीं सकते
वो नेता बन जाएँ...

आइये हाथ उठायें

आइये हाथ उठायें
क्योंकि आसमान सिर पर है
और सूरज को मुट्ठियों में भरना है
कल के उजाले के लिए.

आइये हाथ उठायें
क्योंकि अब वक़्त दुआ नहीं
जड़ से उखाड़ने का है
साफ़ मिट्टी में तन कर खड़े होने का है.

आइये हाथ उठायें
क्योंकि हम मरे नहीं हैं
संवेदनाएं अब भी जिंदा हैं
इसलिए मुट्ठियाँ भींच जाती हैं कभी-कभी.

आइये हाथ उठायें
क्योंकि आत्मा लहुलूहान
लेकिन रीढ़ सलामत है
और लाचार लताओं का सहारा बन सकते हैं.

आइये हाथ उठायें
क्योंकि सड़ी हुई व्यवस्था की सडांध
नथुनों में घुसपैठ कर
बेचैन करने लगी है
और भ्रष्टाचार की जड़ें जकड़ने को तैयार हैं. 

December 5, 2012

तीन ताल

सरकार बच गयी
'मामु' ने बचायी.
सीबीआई का डर!

सब बिक गए,
'तेलंगाना' कैसे बचता!

सबके अपने स्वार्थ,
सबकी अपनी लड़ाई.
जनता फिर ठगाई.

फ़िज़ूल का हंगामा...
लोकतंत्र जिंदा है!

सब मर गए!
ज़मीर मर गया,
उसूल भी ज़मींदोज़.

लोकपाल लपक लिया
आन्दोलन दबा दिया.

एफडीआई, एफडीआई, एफडीआई
अभी नहीं आई
किसने आवाज़ उठायी?

जनता खामोश है
सिलेंडर ख़त्म है.

ये तुम्हारी लड़ाई
जनता कहीं नहीं
तुम लड़ो मरो!

सबकी बेहयाई सामने,
अब तो जाग,
जनता कितना सोएगी?

December 2, 2012

पिल्ले

कुक्कुर मिलाप मौसम की पैदाइश
जाड़े की दस्तक के साथ काफी बढ़ गयी है
राहगीरो! संभल कर गुज़रना
गली के पिल्ले अब बड़े हो गए हैं.

November 30, 2012

मैं विश्रांत हूँ

मैं विश्रांत हूँ...
गतिहीन होकर
शून्य में लटक रहा हूँ!

पूर्ण निस्तब्धता
न कोई कोलाहल
न कोई अंतर्द्वंद्व
एकाग्रचित्त होकर भविष्य को निहार रहा हूँ.

तुम्हारे... उनके
वैचारिक प्रदूषण से मुक्त
ठहर चुका हूँ
नए सृजन के निहितार्थ!

कुंद पड़ते विचारों को
धार दे रहा हूँ
अब उस पर नहीं होगी
बीते ऋतुओं के प्रभावों की छाप!

लंगड़े अतीत!
यहीं तक साथ था
वह देख रहे हो...
गतिमान सुरमई लहरों के पार
वहीँ जाना है
परन्तु, तुम नहीं जा सकोगे
कोई नाव नहीं जाती उस पार
यहीं ठहरो!
कभी कभी
मिलने आ जाया करूँगा तुमसे.

संतोष कर लो
यह जान कर
तुम्हारी मंजिल अब यहीं
और मेरी... उस पार.



November 20, 2012

विधाता

विधाता तुमसे दो प्रश्न-
सृष्टि तुमने रचा?
कितने रंग भरे इसमें?
बस तीन....!!!
देखो, इंसानों ने कितने गढ़ दिए.
अनंत काल से श्रेष्ठ समझे जाते रहे

सर्वोच्च स्थान पाते रहे
प्रासाद में दृश्य होकर भी
अदृश्य रहे!
ढूंढ लिया सदृश कण
कदाचित इंसान तुम्हारे उतना ही करीब है
जितने तुम होकर भी नहीं
किन्तु 'कण' की तरह ठोकर में नहीं.
परदा ऊठ रहा है
नेपथ्य में क्या हुआ
स्पष्ट दिख रहा है
सृष्टि तुमने नहीं रचा.

विधाता! पुनः दो प्रश्न-
भ्रष्टाचार किसकी देन?
तुम या समय
बलवान कौन?
सर्वशक्ति के मद में इतराते रहे!
अनंत काल से पूज्य रहे
प्रकट रूप से कतराते रहे
तुम छलिया....
बलवान तो समय निकला.
भ्रष्टाचार का कलंक
मानव मस्तक पर है
तुम क्यों चढ़ावा पाते हो?

अच्छा....एक प्रश्न शेष-
परलोक...मृत्युलोक...
क्या घनचक्कर है?
दोनों यहीं
दूसरा कोई ज्ञात लोक नहीं
फिर यह भेद क्यों?

.... तो क्या समझूँ?
तुम वो हो जो नहीं हो
या वो हो जो खोज लिए गए!
तुम क्या हो?
कल्पना अथवा साकार
निर्दिष्ट अथवा निराकार?
हा हा हा
मुझे बताना.