July 30, 2012

अभागा दरख़्त

२० जुलाई

दफ्तर के सामने खड़े ठूंठ दरख़्त पर
बरबस निगाह ठहर जाती है
आसपास के पेड़ों पर किसलय
आह! यह कितना अभागा?

हरा- भरा था तब पथिकों को पनाह देता रहा
झुलसे बदन को ठंढक देता रहा
अपने शाखों पर न जाने कितने परिंदों को आश्रय दिए
सूख चुका, फिर भी उसी दर्प से खड़ा है.

इसमें जीवन नहीं है
फिर भी कुछ जीवों का घर है
इस आस में कि जलना है किसी रोज़
किसी दरिद्र नारायण के चूल्हे में
अब भी मौसम की क्रूरता सहता है.

किन्तु सरकार की ईमान इसकी इच्छापूर्ति नहीं होने देगी
जानते हुए... मर चुका है, दरिद्र के घर जलने नहीं देगी.

क्षणिकाएं

५ जुलाई

बहुत मुश्किल है जीना
यहाँ तो पत्थर भी पूजे जाते हैं.
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८ जुलाई

सुबह से ही आसमान में
पर्वतों का डेरा है
आज फिर किसी ग़म ने घेरा है...
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तन भीगा, मन भी भीगने देते
रात पड़ी थी, प्यास बड़ी थी
मेह तनिक और रिसने देते...
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मैं वही हूँ
वहीँ हूँ, जहां से
वर्तमान अतीत बन गया...
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२१ जुलाई

सरकार की कामचोर नीतियों का असर दिख रहा है
रुपहले परदे पर भी बॉडी से प्राण निकल रहा है...
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सोनिया जी सोनिया जी एक काम कीजिये
अपने दिमाग को आराम और बेटे को दूसरा काम दीजिये...
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तुमसे क्या शिकवा गिला करें
तुम्हें तो बैठाया ही था सर आँखों पर
नींद हराम करने के लिए.
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२२ जुलाई

यूपीए कब तक खैर मनायेगा
गठबंधन को टूटने से बचाने
अब कोई प्रणब नहीं आएगा.
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२३ जुलाई
यूपी में प्रगति पर है अखिलेश का काम
बदल दिए गए फिर आठ जिलों के नाम.
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क्या तब भी तुम पूजे जाओगे?


६ जुलाई

विधाता! सुना तुमने
इंसानों ने खोज लिया
वह कण
... किन्तु तुम
उसमें भी नहीं मिले!
अस्तित्व से पर्दा उठेगा
उत्पत्ति का रहस्य भी खुलेगा
एक प्रश्न...
क्या तब भी तुम पूजे जाओगे?
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निकल गयी अकड़!

३ जुलाई

देखा! मैंने कहा था न
एक दिन पर्वत जब
निकलेंगे आखेट पर
तुम्हें निचोड़ देंगे भानु!

आज तू उदित होते हुए भी
अस्ताचल में छिपा है
तेरी रश्मियाँ भी साथ छोड़ गयीं
आखिर तेरी अकड़ निकाल ही दी!
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January 29, 2012

आत्मा से साक्षात्कार

कल रात आत्मा ने देह से कहा-
इस नश्वर काया से मुक्ति चाहती हूँ
इसलिए देह छोड़कर जा रही हूँ.
शरीर सहम गया
उसे प्रलोभन देने लगा
बोला- देखो!
मेरा शारीरिक सौष्ठव
इन बलिष्ठ भुजाओं को देखो
चौड़ी छाती और मेरा रूप देखो
मुझसे ही तो तुम्हारी पहचान है!
आत्मा मुस्कुराई
शायद देह के भीतर पल रहे डर को पढ़ लिया.
कहा- मैं न आती तो ये रूप कैसे पाते?
इतनी अकड़ कैसे दिखाते?
तुम्हारा शरीर अब मेरे लिए पुराना हो गया
मुझे नए लक्ष्य को प्राप्त करना है
इस देह का त्याग कर के
नए देह में जाना है.
न तो तुम
और न तुम्हारा मन ही पवित्र रहा
इसमें छल है, प्रपंच है
एक आसक्ति है
तुम्हारा जीवन ही आडम्बर है
मुझे यहाँ घुटन होती है.
शरीर पसीने पसीने
घबराया हुआ
कांपते हाथ-पैर
और फडफडाते अधर
किसी में तालमेल नहीं
आत्मा से साक्षात्कार के बाद शरीर
घबरा गया.
आत्मा ने उसे मोहलत दी है
अगली पूर्णमासी को
वह इस देह को छोड़ देगी.
शरीर चिंता में है
कोई विकल्प नहीं
बस इश्वर से
चमत्कार की उम्मीद कर रहा है.
हा हा हा हा
इसे कौन समझाए
कलयुग में चमत्कार नहीं होते!

क्षणिकाएं

पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम
लो पटक दिया सर, निकल गया दम.
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स्मृतियों के दुरूह अरण्य में
अपरिणीता कहाँ से आई!
समर्पिता बाँहों के
कितनी सौगातें लाई?
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विधाता! तेरे फैसले बड़े सख्त हैं
पर उससे भी सख्त
तेरी दी ये जान है.
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रब्बा! ये रूह पनाह मांगती है
और ज़िन्दगी
हर पल का हिसाब मांगती है.

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दन्त हीन वृद्ध
विष हीन नख
घर में एक पतोहू
रात-दिन चख-चख...

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माँ! मुझे जनते ही तुमने
थोड़ा नमक क्यों नहीं चखाया?
 तुम्हारे ही कुल की हूँ
पर कुल दीपक क्यों नहीं?

January 26, 2012

मन

लब खामोश हैं
पर लहू अब भी
रह रह कर बग़ावत करता है
धडकनों की शिकायत
रात भर सोने नहीं देतीं...
मन उलझाता है
दिमाग को व्यस्त रखने के लिए
काम दे जाता है!
स्मृतियों में हर दिन बस
एक ही छवि उभरती है
कभी धुंधली
कभी मुखर.
हर रात फैसले की रात होती है
और हर दिन पस्त!
अनमनस्क मन
शरीर को बेजान कर जाता है
जैसे लहू निचुड़ जाता है
हर अंग के अपने-अपने किस्से
और मेरे हिस्से ...
सबके दिए घाव.