July 8, 2011

कभी पूछना

कभी पूछना बादलों से
इस बसंत नभ क्यों रोया था?
क्यों पेड़ों की शाखों पर झूले सूने-सूने थे?
प्रेम का मौसम था
फिर भी मन के उपवन क्यों सूने-सूने थे?
कभी पूछना मन अकुलाया क्यों था?
पिंजड़े के कैदी थे
सोते थे नींद नहीं क्यों आती थी!
कोई ख्वाब पीछे छूट रहा था
कोई साथ कहीं से छूट रहा था
एक साथ कई कई आजमा रहे थे
प्रेम की कसौटी पर कस रहे थे
तब कौन टूटा था?
कभी पूछना
फिर क्या हुआ था?
फिर क्या हुआ था?
सुनो, मैं बताता हूँ
दो मौतें हुई थीं

दो जीवन बदला था
एक अनमना, दूजा पगला सा
ढूंढा था अक्स

आइना मिला था.

March 1, 2011

बस इतना ही था विश्वास!

टूट रहा विश्वास कहो यह किसका है
तेरा है या मेरा है?
कहो अक्स मेरे

क्यों मुझसे तुम दूर हुए?
दोनों में कौन बड़ा था
झूठी कसम या मेरा विश्वास?
ये किस पाश में मुझको फांस दिया?
न जी सकूँ
न मर सकूँ
कैसे भ्रम में डाल दिया!
थोड़ा संयम तुम और रखते 
 एक बार मुझसे तो कहते
छूट रहा है साथ!
आह मेरे अक्स
बस इतना ही था विश्वास!

February 28, 2011

तुम दीप प्रिये मैं पतंग

तुम दीप प्रिये
मैं ठहरा पतंग
तुम पर आकर्षित होता रहूँगा
जल जाना मंज़ूर
मगर अँधेरे में नहीं लौटूंगा.

तुम जलना
घर रोशन करना
मैं ईंधन बन जाऊँगा
अँधेरे में नहीं लौटूंगा.

तुम ज्योति, मैं बाती
रश्मियाँ तल तक
पहुँच नहीं पातीं
कैसे तल के तम हरूँगा?
अँधेरे में नहीं लौटूंगा.

जलना मेरी फितरत
तुमसे मिलन की हसरत
संवरित नहीं कर पाऊंगा
तुम जलना
संग मैं भी जल मरूँगा
अँधेरे में नहीं लौटूंगा.







February 26, 2011

ऊँचे हो तो और ऊँचे उठो

ऊँचे हो तो और ऊँचे उठो ना
किसने रोका है?
नीचे देखने से पाताल नहीं दिखेगा
हर आहट किसी के
आने की नहीं होती
ऊंचाई से दुनिया बौनी भले दिखे
पर हक़ीक़त में क्या बौनी होती है??
मन के भ्रम हैं
किसी के गिराने से कोई गिरता कहाँ है!!!

गुलाब

ये तो गुलाब थे
इन्हें क्यों तोड़ा
पंखुड़ियां ही समेट ली
काटों को क्यों छोड़ा??????
 
22.7.2010
 

January 1, 2011

मैं गया वक़्त नहीं

आज मेरे वजूद को चुनौती देने वालों
कल मेरा भी दिन आएगा
मैं गया वक़्त नहीं
जो कभी लौट के आ न सकूँगा!
चोट करो, उपहास करो
चाहे जितना प्रयास करो
मैं कोई तृण नहीं
जो उड़ जाऊंगा...
मैं भविष्य के सुनहरे पथ का स्तम्भ हूँ
अगर धंस भी गया तो
मील का पत्थर कहलाऊंगा.

October 14, 2010

बाँध दिया है खुद को

एक डोर से बाँध दिया है खुद को
जब लगे दूर जा रहा हूँ
आहिस्ता अपनी ओर खींचना
रिश्तों को ताज़ा रखना!
न मानूँ, डांटना-फटकारना
कभी प्यार से समझाना...
मैं बहती नदी की मनमौज धारा हूँ
हर बार दूर भागूँगा
नयी राह बनाना मेरी फितरत है.
हमारे रिश्तों को
तुम्ही संभाल के रखना
मैं उसपर जमा गर्द धोता रहूँगा
राह गर मुश्किल लगे कहना
मैं बिछ जाऊंगा.
न कभी दूर होना, न मुझे दूर होने देना,
क्योंकि मैंने खुद को
एक बंधन में बाँध जो दिया है...