October 14, 2009

32. भटकना मत

सबकुछ छोड़ देना
सपने देखना
कभी मत छोड़ना
बेशक बिसार देना मुझे
मेरा प्रेम न बिसराना।
बढ़ते रहना
चलते रहना
राह भटकाता दिखे कोई
तब सामने धंसे
मील के पत्थर को देखना
सही राह दिखायेगा।
फ़िर एक दिन
जब सबकुछ हासिल कर लो
सिर्फ़ एक बार पीछे मुडकर देखना
गहरी साँस फेफड़ों में भरकर
शांत मन से एक क्षण को
मुझे नहीं
मेरा प्रेम याद करना
उस मील के पत्थर को देखना
वह मैं ही था.

31. तुम्हें याद है????

तुम्हें याद है
वह पहली मुलाकात...
कैसे घबरा कर हाथ छुड़ाया था
क्या होगा अब?
सोचकर शायद
धवल रूप कुम्हलाया था।
सच कहूं
ह्रदय तड़प उठा था
मन आशंकित था
उस दिन जेठ की दुपहरी में
पता नहीं कब तक चलता रहा
यह सोचकर
क्या होगा अब?
क्या तुम्हें याद है?
(कोई जवाब नहीं)
हाँ, मुझे अब भी याद है
सबकुछ आईने की तरह साफ़ है
मानो कल ही की बात है।

दूसरी मुलाकात
याद आया...
पेडों की छाँव में
सीढियों से उतर कर
तुम आयीं थी मुझे ले जाने
बंद कमरे में साथ रहे
हम दो दिन तक
तब तुमने ही तो कहा था
...लगता है मानो
बरसों से हम जानते हैं
एक-दूसरे को!
तब दूसरी बार तुम्हें
छुआ था
गले भी लगाया था
सिहरन आज भी होती है।
फ़िर एक दिन
मेरे साथ तुम घर आयीं
तुम्हें पलकों पर बैठाऊं
बाहों के झूले में झुलाऊं
कुछ ऐसे ही उलझन में था
तब तुम्हीं ने तो कहा था
- हमेशा साथ रहूंगी।
उसके बाद
कई बार आयीं तुम मेरे घर
फ़िर आखिरी बार
वह भी याद है।
उसके बाद क्या हुआ?
मुझे कुछ याद नहीं!!!
क्या हुआ?
क्यों हुआ?
कैसे हुआ?
एक दिन अचानक तुम दूर चली गयीं
मुझे कुछ नहीं पता
कुछ भी याद नहीं
क्या तुम्हें याद है??
बताओ न
सचमुच
मुझे कुछ याद नहीं......

30. सपने भी पलते हैं

कभी ख़्वाबों को भी पंख दो
ये उड़ना चाहते हैं
इन्हें उन्मुक्त छोड़ कर देखो
ये भटकते नही
न ही ओझल होते हैं।
सपने कभी भारी नहीं होते
ये उम्मीदों पर पलते हैं
भावनाओं में बसते हैं।
इनमें छल नहीं होता
ये निश्छल होते हैं।
कभी डूबो-उतराओ इनमें
सींचो...
ये भी पलते हैं
इन्हें सहेजो, पालो
क्योंकि सपने भी फलते हैं...

October 11, 2009

29. कहाँ गयी तुम मृगनयनी

कहाँ गयी तुम मृगनयनी
मुझको अपने कुंतल में उलझाकर
सुख शान्ति सब ठुकराकर
प्रेम मेरा पल में बिसराकर
किस नगर जा बैठी हो?
दीप प्रेम का प्रज्ज्वलित कर मन में
धवल रूप से घर को रोशन कर
कहाँ गयी तुम मृगनयनी?
व्याकुल नयना रास्ता देखें
ह्रदय तेरे ही नाम पे धड़के
कैसे इसे बहलायें?
बता मेरी मृगनयनी ...

तीन तसवीरें तेरी दो वस्त्रों में
उलझा हूं अब तक
कैसे भिजवाऊं इन्हें मैं तुम तक
इतना ही बतला दो...

October 9, 2009

गांधी, ग़दर और गर्दिश

सबसे पहले नमस्कार उस चमत्कार को जो अप्रत्याशित रूप से दुनिया के सामने आया.अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को शान्ति का नोबेल पुरस्कार मिला है. दुनिया भर में डुगडुगी बज रही है। मजे की बात ओबामा सो रहे थे, उन्हें जगाया गया यह कह कर कि हे महाशक्तिमान! जागो अब तो आपने सर्वोच्च सम्मान पा लिया। अमेरिकियों को तो लग रहा है कि वे अभी सोते हुए सपना देख रहे हैं ...उन्हें भी इस चमत्कार पर घोर आश्चर्य है।
हमें यह बात हज़म नहीं हुई ....साहब दुनिया को भी नहीं हो रही.युगों से संसार को शाति का पाठ हम पढ़ा रहे हैं ...जब पुरस्कार कि बारी आई तो हमें झुनझुना थमा दिया। जिस गांधी के पदचिन्हों पर चलकर ओबामा ने मात्र नौ माह के कार्यकाल में ही यह सम्मान पा लिया...अभी तो चार साल तीन माह का कार्यकाल बचा हुआ है ...लेकिन पाँच बार नाम लिखाकार भी गांधी को यह सम्मान नसीब नहीं हुआ। मतलब गुरु गुड़ और चेला चीनी!
अभी क्या देखा है साहब! ...अभी और बड़ा देखेंगे...आँखें फट जाएँगी जब पाकिस्तान को अपने घर में खडा देखेंगे..पूछिये क्यों? भाई साहब, माई बाप ने पाकिस्तान को ८५ अरब डॉलर की मदद दी इसलिए कि वो आतंकवाद से लड़े, लेकिन वह इसका इस्तेमाल कहाँ करेगा...आपको और और सारी दुनिया को मालूम है...७० अरब डॉलर कि नयी खेप के भुगतान कि घोषणा सम्मान पाने के तत्काल बाद कर दी गयी। मैं कहता हूँ दो चार दिन रुक जाते तो कुछ बिगड़ जाता क्या? पुरस्कार पर जो बवाल उठा है वो तो ठंडा पड़ने देते.नींद से जाग तो जाते पहले!
शायद बहुत कम लोग यह बात हज़म करें। पर है सच। गांधीजी अगर अफ्रीका में ही रहते...नीग्रो के हक के लिए लड़ते तो वे वैश्विक शान्ति के पुरोधा ज़रूर बनते...लेकिन वे पुअर पीपुल, इंडियन पीपुल के लिए लड़ने भारत लौट आए.उनका नाम तो अफ्रीका से ही चमका था न.गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे, लेकिन ओबामा सठे साठ्यम समाचरेत में यकीन रखते हैं। इसलिए शान्ति का नोबेल तो उन्हें ही मिलना चाहिए.एक बात और...गांधी को इसलिए भी यह पुरस्कार नहीं मिला क्योंकि भूखे नंगे भारतीय इसे क्या खाक संभालते जब गांधी की तुच्छ वस्तुओं को ही नहीं संभल पा रहे हैं। उनकी चिट्ठियाँ तक नहीं रख पा रहे हैं! मैं कहता हूँ साहब एक करोड़ पुअर पीपुल के लिए लड़ के क्या मिल सकता है किसी को? २०० साल की गुलामी की बंदिश तोड़ने के लिए अहिंसा के रास्ते चलने की क्या ज़रूरत थी? इन सबके लिए दोषी गांधी ही थे।
शान्ति के जिस नोबेल पुरस्कार पर हाय तौबा मची है, ख़ुद ओबामा तक को आश्चर्य है कि यह चमत्कार हो कैसे गया...मेरी नज़र में व्यर्थ की चिल्ल-पों है. जब ख़ुद नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति ने ही कह दिया कि भाई हमने पुरस्कार कि घोषणा करने में जल्बाजी नहीं की.बात तो यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए...है कि नहीं! पुरस्कार के लिए इंसान का विरोध भी ज़रूरी है जैसे अफगान नीति पर अपने ही देश में ओबामा की हो रही है। गांधीजी तो का न तो देश में विरोध है और न ही विदेशों में...फ़िर उन्हें क्यों मिले यह सम्मान? ओबामा ही क्यों जिन दर्ज़न भर महान विभूतियों के नोबेल सम्मान पर बवाल मचा वह भी भी निरापद था.

August 1, 2009

28. चलो तुम्हें ले चलता हूँ


चलो तुम्हें ले चलता हूँ
एक ऐसी जगह
जहाँ खुली हवा, मद्धम चाँदनी
तितलियों का जमघट
और झरनों का बहता पानी होगा।
चलो वहाँ ले चलता हूँ तुमको
जहाँ आसमान झुक कर
चूमता है धरा को
लाल-लाल आभाओं के उसी आकाश तले चलो।
चलो तारों के झुरमुटों से झांकते
चाँद को निहारेंगे
धवल चांदनी में नहायेंगे
थक गए तो
किसी तरुवर की छाँह तले सुस्तायेंगे।
कहो... चलना है?

चलो तुम्हे ले चलता हूँ